दुर्ग-भिलाईफीचर्डसाक्षात्कार

ईलाज के बाद जब मरीज आकर बताते है कि पहले से आराम है तब मेरी खुशी हो जाती है दुगुनी : डॉ. स्मृति पाण्डेय

भिलाई (सारनाथ एक्सप्रेस)। मेडिकल फील्ड एक ऐसा फील्ड है, जिसमें चीजे हर रोज बदलती है। इसलिए हमें हमेशा अपडेटेड रहना पड़ता है। इस फील्ड में हमे जिंदगी भर पढ़ना है, हर दिन नया सीखना है, तभी हम मरीजो का बेहतर ईलाज कर पाएंगे। यह सब बातें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, भिलाई-3 में मेडिकल ऑफिसर के पद पर पदस्थ युवा डॉक्टर स्मृति पाण्डेय ने सारनाथ एक्सप्रेस से विशेष बातचीत में कही। इन्होंने अपने अब तक के सफर को हमसे साझा किया।
डॉ. स्मृति पाण्डेय मूलतः सिमगा (रायपुर) से है। इनकी प्रारंभिक एवं हायर सेकंडरी तक कि शिक्षा होली क्रॉस स्कूल, पेंशनवाड़ा, रायपुर में हुई। चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज, नेहरूनगर, भिलाई से इन्होंने वर्ष 2020 में एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। डॉ. स्मृति बताती है, वैश्विक महामारी कोविड-19 के समय दुर्ग जिला में संविदा पद पर डॉक्टर्स की भर्ती निकली। इनका चयन भिलाई-3 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के पड़ पर हुआ, जहाँ आज डॉ. स्मृति रेगुलर और कोरोना मरीजों का बेहतर ईलाज जिम्मेदारी के साथ कर रही है।
हर वो औरत जो घरों से निकलकर देश सेवा कर रही है, समाज सेवा कर रही है, घर भी चला रही है और नाम रौशन कर रही है। उन सभी महिलाओं को अपना आदर्श मानने वाली और किताबें पढ़ने में रुचि रखने वाली डॉ. स्मृति पाण्डेय अपने बचपन के बारें में बताती है कि मैं हमेशा से शांत स्वभाव की रही हूँ। मेरी मम्मी डॉक्टर थी और उनका सपना था कि मैं भी उनकी तरह डॉक्टर बनू और समाज की सेवा करूँ। तब खरोरा एक छोटा गांव हुआ करता था, जहाँ मेरी माताजी की पोस्टिंग थी। सपना बड़ा था और रास्ता लंबा, तब अच्छी शिक्षा के लिए मेरे मम्मी-पापा ने मुझे नाना-नानी के घर रायपुर में रखने का फैसला लिया। सब कुछ अच्छा चल रहा था, मैं मन लगाकर पढ़ाई भी कर रही थी, लेकिन अचानक मेरी जिंदगी बदली क्योंकि मेरे लिए सपना देखने वाली मेरी मम्मी हम सबसे दूर चली गई, उनका निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया। उस वक्त तक मुझे डॉक्टर बनाने का सपना मेरी मम्मी का था। फिर मैंने अपनी मम्मी की आखिरी ईच्छा को अपना सपना बनाया और आज मैं देश व समाज की सेवा के उद्देश्य से डॉक्टर बनकर तैयार हूं। इसमें अहम योगदान मेरे सच्चे दोस्त मेरे पापा का भी रहा है।
कोविड-19 का प्रकोप जब चरम पर था तब मैंने ड्यूटी ज्वाइन की, मुझे अस्थमा की शिकायत है। मेरा परिवार मेरी चिंता कर रहा था लेकिन मैं अपना फर्ज निभाना चाहती थी, इसलिए मैंने बिना देरी चयन होते ही ज्वाइन कर लिया। इस बीच मरीजों का इलाज करते हुए मैं भी कोरोना संक्रमित हुई। मेरा ईलाज हुआ, ठीक हुई और फिर से मरीजों की लगातार सेवा कर रही हूँ।
मेरे काम करने का उद्देश्य यही रहता है कि मरीज जिस विश्वास से ईलाज कराने आते है, उसे सही साबित कर उनके लिए और बेहतर कर सकूं। ज्यादातर सरकारी अस्पतालों को लेकर समाज मे छवि खराब है, जिसे मैं दूर करने का भरपूर प्रयास करती हूँ।
भिलाई-3 में ग्रामीण क्षेत्र के बहुत से मरीज आते है, जिनका ईलाज करके बहुत खुशी मिलती है, जब मरीज ठीक होकर, आकर बताते है कि अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रहें है, तब मेरी खुशियां दोगुनी हो जाती है।
हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी –
हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी है, सोसायटी से जुड़कर इस बीमारी का भी ईलाज कर रही हूँ। यह बीमारी बहुत कम लोगों में होती है। छत्तीसगढ़ में इसके करीब 100 मरीज है, यह एक बहुत ही गंभीर बीमारी है। इस बीमारी की वजह से कई बच्चों ने अपनी जान भी गवाई है। समय के साथ कुछ परिवर्तन आया अब रायपुर अंबेडकर अस्पताल में इसका ईलाज भी शुरू हो गया है, इंजेक्शन भी अब उपलब्ध है।
अंत में यही बताना चाहूंगी कि मेरे डॉक्टर बनने का सपना भले ही मेरी मां का था लेकिन इसे पूरा करने के लिए मेरे पापा ने जी तोड़ मेहनत की और परिवार का भी सहयोग रहा।

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