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जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे : पीएम मोदी

सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही। इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है…

 

 

नईदिल्ली (ए)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पुराने प्रसंग को याद किया। उन्होंने बताया कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि सरकार और बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को इस काम से नहीं जुड़ना चाहिए।

अपने ब्लॉग में प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी सरदार वल्लभभाई पटेल पर आई। यह वही मंदिर है, जिस पर साल 1026 में आक्रमण हुआ था। उन्होंने बताया कि दीपावली 1947 में सरदार पटेल जब सोमनाथ पहुंचे, तो वहां की स्थिति देखकर वे बहुत भावुक हो गए। इसी यात्रा के बाद उसी स्थान पर मंदिर को दोबारा बनाने का फैसला हुआ।

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खोला गया। उस समय देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस ऐतिहासिक अवसर पर मौजूद थे।

पीएम मोदी के अनुसार, पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि सरकार आधिकारिक रूप से इस मंदिर के पुनर्निर्माण से न जुड़े। वे राष्ट्रपति और मंत्रियों की मौजूदगी के भी पक्ष में नहीं थे। नेहरू का मानना था कि इससे भारत की छवि पर गलत असर पड़ेगा। हालांकि, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने फैसले पर अडिग रहे और समारोह में शामिल हुए।

उन्होंने लिखा कि दुर्भाग्य से सरदार पटेल इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे लेकिन उनका सपना देश के सामने साकार होकर खड़ा था। उन्होंने लिखा, “तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वे नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।”

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ मंदिर की बात के.एम. मुंशी का जिक्र किए बिना अधूरी है। उन्होंने सरदार पटेल का पूरा साथ दिया। मुंशी की किताब ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ को प्रधानमंत्री ने बेहद ज्ञानवर्धक बताया और कहा कि इसका नाम ही भारत की सभ्यतागत सोच को दर्शाता है, जिसमें आत्मा और विचारों की अमरता पर विश्वास किया जाता है।

उन्होंने कहा, “हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही। इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है।

दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।”

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