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वकीलों को जाति-धर्म के आधार पर नहीं बांट सकते, अदालत बोली- बार संघ चुनाव में आरक्षण नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता संघ चुनाव में वकीलों को जाति के आधार पर आरक्षण देने से इनकार कर दिया। बंगलूरू अधिवक्ता संघ चुनाव को लेकर एनजीओ एडवोकेट्स फॉर सोशल जस्टिस की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह ने कहा कि हम अधिवक्ताओं को जातिगत आधार पर बंटने नहीं देंगे और न ही हम इसका राजनीतिकरण होने देंगे…

 

 

नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता संघ चुनाव में वकीलों को जाति के आधार पर आरक्षण देने से इनकार कर दिया। बंगलूरू अधिवक्ता संघ चुनाव को लेकर एनजीओ एडवोकेट्स फॉर सोशल जस्टिस की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह ने कहा कि हम अधिवक्ताओं को जातिगत आधार पर बंटने नहीं देंगे और न ही हम इस मुद्दे का राजनीतिकरण होने देंगे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह संवेदनशील मुद्दा है। यह एक पिटारा खोल देगा और हमें लगता है कि बिना किसी आंकड़े के ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करना अलग बात थी। हम बार के सदस्यों को जाति के आधार पर बंटने नहीं देंगे। इस मुद्दे का हम राजनीतिकरण नहीं होने देंगे।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि हम किसी भी प्रासंगिक आंकड़े के बिना ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं। देश के सांसद विभिन्न मुद्दों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने के लिए संवेदनशील हैं। उन्होंने कहा कि जब भी आरक्षण को लेकर कोई विधेयक आता है, तो इससे विशेषज्ञ बहुत सारी बहस और विचार-विमर्श करते हैं। अलग-अलग आंकड़े जुटाए जाते हैं। आप इसे देखकर निर्णय ले सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि आज हम बिना किसी उचित डाटा के ऐसा करने में अक्षम हैं। इस मामले गंभीर प्रश्न मानते हुए बार एसोसिएशन से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जांच करेंगे। ऐसे मामलों के लिए उचित आंकड़ें और विश्लेषण की जरूरत होती है। हम जानना चाहते हैं कि कानूनी पेशे में विशेष समुदाय से कितने लोग हैं और उनका प्रतिनिधित्व कहां तक कम है।

याचिका में यह मांग की गई
याचिका में एनजीओ एडवोकेट्स फॉर सोशल जस्टिस ने मांग की है कि बंगलूरू अधिवक्ता संघ चुनाव में एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान किया जाए। इस पर पीठ ने कहा कि यह दोनों पक्षों की ओर से बहस योग्य मुद्दे उठाए गए हैं। इस पर स्वस्थ वातावरण में बात की जानी चाहिए। हम बार निकायों को ऐसे मु्द्दों बंटने नहीं देना चाहते। यह हमारा इरादा नहीं है। पीठ ने इस मु्द्दे को लंबित चल रहे बार एसोसिएशन को मजबूत करने के मामलों के साथ जोड़ दिया। इस पर 17 फरवरी को सुनवाई होगी।

एनजीओ की ओर से याचिकाकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि पिछले 50 साल से बंगलूरू अधिवक्ता संघ के कार्यकारी निकाय में एससी-एसटी और ओबीसी श्रेणी से एक भी सदस्य की नियुक्ति नहीं हुई है। अन्य देशों में बार निकाय चुनाव में आरक्षण और अन्य सकारात्मक कार्य किए जाते है। इससे युवाओं को बार के सदस्य के रूप में आगे आने का मौका मिलता है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
इससे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने  याचिकाकर्ताओं को मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की सलाह दी थी। वहीं 28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने  अपने 24 जनवरी के आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि अधिवक्ता संघ में उपाध्यक्ष का अतिरिक्त पद सृजित किया जाए।  कोर्ट ने पहले आदेश दिया था कि अधिवक्ता संघ में कोषाध्यक्ष का पद महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित होगा। मगर तब तक तमाम पुरुष अधिवक्ता इस पद के लिए नामांकन कर चुके थे। कोर्ट के आदेश को लेकर अधिवक्ता संघ के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किए थे।

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