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आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं फिर भी लड़कों को भुगतना पड़ता है POCSO का खामियाजा, कोर्ट ने युवक की सजा की रद्द

मार्च 2018 में घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। वह महेश (आरोपी) को जानती थी जो उसके बड़े भाई का दोस्त था। महेश ने लड़की के सामने फोन पर शादी का प्रस्ताव रखा। लड़की ने उसे बताया कि उसके माता-पिता उसकी मर्जी के खिलाफ किसी और से उसकी शादी तय कर रहे हैं। 4 मार्च 2018 को लड़की अपना घर छोड़कर महेश के साथ चली गई। दोनों महेश के चाचा के घर गए और वहां शादी कर ली…

 

 

चेन्नई (ए)। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने हाल ही में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जब किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराध माना जाता है, तो अक्सर युवा लड़कों को ही इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ता है। जस्टिस एन. माला ने एक पॉक्सो मामले में दोषी ठहराए गए एक युवक की सजा को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले अक्सर किशोरों के प्रेम प्रसंगों का माता-पिता द्वारा विरोध किए जाने के कारण दर्ज कराए जाते हैं।

मिली जानकारी के मुताबिक अदालत ने कहा कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों के मामलों में अक्सर युवा लड़के को ही अंजाम भुगतना पड़ता है। माता-पिता के दबाव में लड़की को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिसके बाद लड़के के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी जाती है और उसे लंबी जेल काटनी पड़ती है।

यह फैसला ‘महेश’ नामक एक युवक की आपराधिक अपील पर सुनाया गया। इससे पहले नागरकोइल की एक पॉक्सो अदालत ने 23 जून 2025 को महेश को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 (अपहरण और शादी के लिए मजबूर करना) और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(l)/6 के तहत दोषी ठहराया था।

ट्रायल कोर्ट ने महेश को पॉक्सो अपराध के लिए 20 साल के कठोर कारावास और अपहरण के लिए 5 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं एक साथ चलनी थीं।

मिली जानकारी के अनुसार, मार्च 2018 में घटना के समय पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। वह महेश (आरोपी) को जानती थी जो उसके बड़े भाई का दोस्त था। महेश ने लड़की के सामने फोन पर शादी का प्रस्ताव रखा। लड़की ने उसे बताया कि उसके माता-पिता उसकी मर्जी के खिलाफ किसी और से उसकी शादी तय कर रहे हैं। 4 मार्च 2018 को लड़की अपना घर छोड़कर महेश के साथ चली गई। दोनों महेश के चाचा के घर गए और वहां शादी कर ली।

5 अप्रैल 2018 तक दोनों पति-पत्नी की तरह रहे। इसी बीच चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर किसी ने गुमनाम कॉल कर दी, जिसके बाद जिला बाल संरक्षण इकाई के अधिकारियों ने उन्हें पकड़कर नागरकोइल के महिला पुलिस स्टेशन को सौंप दिया। लड़की की शिकायत के आधार पर पॉक्सो का केस दर्ज हुआ।

अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में एक बुनियादी खामी पाई। पॉक्सो एक्ट लगाने के लिए पीड़िता की उम्र (नाबालिग होना) साबित करना सबसे जरूरी है। पुलिस ने लड़की की उम्र साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की सिर्फ फोटोकॉपी पेश की थी, जबकि मूल दस्तावेज उपलब्ध थे।

अदालत ने कहा कि कानून का नियम है कि ‘प्राथमिक साक्ष्य’ (ऑरिजिनल) ही पेश किए जाने चाहिए। साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत, जब तक मूल दस्तावेज पेश न करने का कोई उचित कारण न बताया जाए, तब तक ‘द्वितीयक साक्ष्य’ (फोटोकॉपी) स्वीकार नहीं किए जा सकते। चूंकि पुलिस ने मूल दस्तावेजों के उपलब्ध होने के बावजूद केवल फोटोकॉपी पर भरोसा किया, इसलिए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को घातक भूल करार दिया। उम्र साबित न होने के कारण हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और जेल से रिहा करने का आदेश दिया।

अदालत ने इस मामले को ऐसा ‘टिपिकल केस’ बताया जहां आपसी सहमति से बना किशोरों का रिश्ता माता-पिता के विरोध के कारण एक दुखद मोड़ पर खत्म हो गया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुधा (2026) का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए सरकार को सुझाव दिया था कि वह सच्चे किशोर प्रेम प्रसंगों को इस कठोर कानून से छूट देने के लिए एक रोमियो-जूलियट क्लॉज लाने पर विचार करे।

हाईकोर्ट ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए तमिलनाडु के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे पॉक्सो अधिनियम की धारा 43 को सख्ती से लागू करवाएं, जो कानून के बारे में जन जागरूकता फैलाने को अनिवार्य बनाती है। अदालत ने कहा कि पॉक्सो एक्ट और इसके कठोर प्रावधानों के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार से इस तरह के मामलों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। राज्य सरकार को सरकारी और निजी स्कूलों-कॉलेजों में जागरूकता शिविर लगाने को कहा गया है ताकि छात्रों और माता-पिता को इस कानून के गंभीर परिणामों के बारे में बताया जा सके। मुख्य सचिव को इस संबंध में उठाए गए कदमों पर 3 जून 2026 तक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

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