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स्पंदन: हताशा का रोमांस- IPS मयंक श्रीवास्तव

स्पंदन: हताशा का रोमांस
जब उसने अपने माथे की नस दबाई ना, खून बहने का स्पंदन साफ़ साफ़ महसूस किया। “दिल खून फेंकता है, जब वो सिकुड़ता है। क्या होता है दो सिकुड़न के बीच? खून जाता है क्या? खून नसों में लगातार बहता होता तो क्या ये स्पंदन महसूस होती नसों में, क्या स्टेडी स्टेट रहती है ब्लड फ्लो की नसों में?

दो स्पंदन के बीच कुछ नहीं होता, ज़िंदगी थम जाती है। मेरी ज़िंदगी हृदय की, नसों की इन्हीं दो सिकुड़न के बीच की जीवनहीनता है। मेरी जिंदगी में बस एक चीज़ की कमी है- जिंदगी की।” इस सुबह भी विजय बिस्तर से सोने के बाद उठने के पहले सोने की कोशिश करते करते निराशा भरी सोच में डूब चुका था कि तभी अमित ने उसके बेडरूम का दरवाज़ा खटखटा दिया।

जगते हुए भी सोने की कृत्रिम दुनिया में बने रहते हुए, विजय ने आवाज़ को अनसुना कर दिया, आदतन। मगर अमित उसका लंगोटिया यार जो ठहरा, खटखटाहट को भड़भड़ाहट में बदलने में देर नहीं लगी।

अब विजय को उठना ही पड़ा, समझ भी गया था वो कि अमित ही होगा। बाक़ी सब घर के लोग उसकी थकी आदतों से, हताशा से हताश हो चुके थे। वो उसे उसकी दुनिया की धीरे धीरे रेंगती गाड़ी से खींचकर कर उतारने का कोई भी इरादा छोड़ चुके थे।

अंदर घुसते ही अमित ने उसके नितंबों पे चपत लगाते हुए कहा, ” चल बे, आज एक रोमांटिक फ़िल्म देखने चलते हैं।”
क्रमशः

आईपीएस मयंक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से….

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