रायपुर। बस्तर की पहचान अब धीरे-धीरे बदल रही है। पारंपरिक खेती वाले इस क्षेत्र में अब बागवानी के नए प्रयोग सफल होने लगे हैं। महात्मा गाँधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित क्रांतिकारी डेब्रिधुर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र जगदलपुर के वैज्ञानिकों की 09 वर्षों की सतत मेहनत ने इतिहास रच दिया है।
पहली बार बस्तर में लीची के पौधों में सफल फलन हुआ है, जिसे कृषि क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इस सफलता की शुरुआत वर्ष 2016-17 में हुई थी, जब तत्कालीन वैज्ञानिक डॉ. गणेश प्रसाद नाग ने अनुसंधान केंद्र अंबिकापुर से लीची की उन्नत किस्मों को लाकर जगदलपुर स्थित महाविद्यालय प्रक्षेत्र में रोपण कराया। उस समय बस्तर की जलवायु में लीची की खेती को लेकर कोई ठोस उदाहरण मौजूद नहीं था, बावजूद इसके वैज्ञानिकों ने इसे चुनौती के रूप में लिया और शोध कार्य शुरू किया।
उद्यानिकी महाविद्यालय प्रक्षेत्र में इंद्रा लीची-2, अंबिका लीची-1, चाइना, शाही और रोज सेंटेड जैसी पांच प्रमुख किस्मों के करीब 40 पौधे लगाए गए। शुरुआती वर्षों में इन पौधों की वृद्धि, जलवायु के प्रति अनुकूलन क्षमता और उत्पादन पर लगातार अध्ययन किया गया। लंबे इंतजार और वैज्ञानिक प्रबंधन के बाद अब इन पौधों में फल लगना शुरू हो गया है।
फल विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक डॉ. रामकुमार देवांगन ने पौध प्रावर्धन, पुष्पन, फल सेट सुधार, ट्रेनिंग, प्रूनिंग और फ्रूट क्रैकिंग जैसी समस्याओं पर गहन शोध किया। वहीं डॉ. भागवत कुमार भगत ने लीची के मूल्य संवर्धन जैसे जूस, जैली और अन्य उत्पाद पर काम कर इसे बाजार से जोड़ने की दिशा में पहल की है।
उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रवि रतन सक्सेना ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर वैज्ञानिकों की सराहना करते हुए कहा कि बस्तर में लीची की सफल फलन केवल एक शोध सफलता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कृषि विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि सिद्ध करती है कि वैज्ञानिक अनुसंधान, धैर्य और नवाचार के माध्यम से बस्तर जैसे पारंपरिक कृषि क्षेत्र में भी उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की अपार संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
उन्होंने आगे कहा कि लीची जैसी नगदी फसल का सफल उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और क्षेत्र में बागवानी आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगी। कुलपति ने यह भी उल्लेख किया कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल नई फसल तकनीकों का विकास करना ही नहीं, बल्कि उन्हें किसानों तक पहुंचाकर उनके आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करना है।
प्रो. सक्सेना ने वैज्ञानिकों के 09 वर्षों के सतत प्रयास, अनुसंधान क्षमता और समर्पण की प्रशंसा करते हुए विश्वास जताया कि आने वाले समय में बस्तर क्षेत्र लीची उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के क्षेत्र में भी नई पहचान बनाएगा। उन्होंने इसे आत्मनिर्भर कृषि, रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला परिवर्तनकारी कदम बताया। वहीं उद्यानिकी महाविद्यालय जगदलपुर के वर्तमान अधिष्ठाता डॉ. नाग ने बताया कि जिन उन्नत किस्मों को विकसित करने में सफलता मिली है, उनके पौधे अब किसानों को उनकी मांग के अनुसार उपलब्ध कराए जाएंगे। साथ ही किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाएगा, ताकि वे इस नई फसल को आसानी से अपना सकें।
साल 2016-17 में इस परियोजना की शुरुआत एक प्रयोग के तौर पर की गई थी। अनुसंधान केंद्र, अंबिकापुर से लाई गई पांच उन्नत किस्मों इंद्रा लीची-2, अंबिका लीची-1, चाइना, शाही और रोज सेंटेड को केडीसीएचआरएस जगदलपुर के प्रक्षेत्र में रोपित किया गया। शुरुआती वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती बस्तर की जलवायु के अनुसार पौधों को अनुकूल बनाना था। वैज्ञानिकों ने सिंचाई, पोषण प्रबंधन और रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया। लगभग 09 वर्षों के धैर्यपूर्ण प्रयासों के बाद पौधों में सफल फलन हुआ, जो इस बात का प्रमाण है कि बस्तर में भी लीची की खेती संभव है।
लीची की सफल खेती बस्तर के किसानों के लिए नई आर्थिक संभावनाएं खोल रही है। अब तक सीमित फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान इस नगदी फसल को अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं। बाजार में लीची की अच्छी मांग और कीमत मिलती है, जिससे किसानों को सीधे लाभ की संभावना है, साथ ही बागवानी आधारित खेती से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। जिससे क्षेत्र के लोगों की आर्थिक समृद्धि को बल मिलेगा। महाविद्यालय प्रक्षेत्र अब एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां किसान प्रशिक्षण लेकर आधुनिक तकनीकों को सीख सकेंगे।
उद्यानिकी महाविद्यालय के वैज्ञानिकों ने केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर लीची के मूल्य संवर्धन पर भी काम शुरू किया है। जूस, जैली, स्क्वैश जैसे उत्पादों के विकास पर शोध किया जा रहा है, जिससे किसानों को कच्चा फल बेचने के बजाय अधिक मुनाफा मिल सके। इसके साथ ही ग्राफ्टिंग, फ्रूट सेट सुधार और फ्रूट क्रैकिंग रोकने जैसी तकनीकों पर भी काम जारी है। भविष्य में यह पहल बस्तर को लीची उत्पादन और प्रसंस्करण का एक प्रमुख केंद्र बना सकती है।


















