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शरद पूर्णिमा आज: भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करने से मिलती है सुख- शांति, जानिए शुभ मुहूर्त और डिटेल?

आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि इन शुभ कार्यों को करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है…

 

नईदिल्ली (ए)। हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के अगले दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है. इस साल शरद पूर्णिमा का पावन पर्व आज 16 अक्टूबर को मनाया जाएगा. हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है. इसे आरोग्य का पर्व भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर रातभर अपनी किरणों से अमृत वर्षा करता है।

शारदीय नवरात्रि के बाद शरद पूर्णिमा का पावन पर्व पड़ता है. इस वजह से भी शरद पूर्णिमा का खास महत्व होता है. देश के कई राज्यों में इसे फसल उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है. इस दिन खीर बनाने की भी प्रथा है. खीर को रातभर चंद्रमा की चांदनी में रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन रातभर खीर को चंद्रमा की चांदनी में रखने से खीर अमृत के समान हो जाती है और इस खीर का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है।

शरद पूर्णिमा स्पेशल खीर-

शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी को गाय के दूध में बनी चावल की खीर का भोग लगाया जाता है. माता को पीले या सफेद रंग की मिठाइयों का प्रसाद लगाया जाता है. मान्यता है कि इस दिन रातभर खीर को चंद्रमा की चांदनी में रखने से खीर अमृत के समान हो जाती है. इस खीर को बनाने के लिए आपको चावल, गाय का दूध, चीनी, इलायची पाउडर की आवश्यकता होती है।

शरद पूर्णिमा शुभ मुहूर्त- 

पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 16 अक्टूबर को रात्रि 08 बजकर 40 मिनट पर होगी. वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 17 अक्टूबर को शाम को 04 बजकर 55 मिनट पर होगा।

शरद पूर्णिमा पूजन विधि- शरद पूर्णिमा के दिन सुबह उठकर स्नान आदि कर लें. घर के मंदिर को साफ करके माता लक्ष्मी और श्री हरि के पूजन की तैयारी कर लें. इसके लिए एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं।

इस पर माता लक्ष्मी और विष्णु जी की मूर्ति स्थापित करें. शरद पूर्णिमा में माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है. उनके आठ रूप हैं, जिनमें धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, राज लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, कमला लक्ष्मी एवं विजय लक्ष्मी है।

ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान शंकर एवं माँ पार्वती कैलाश पर्वत पर रमण करते हैं, तथा संपूर्ण कैलाश पर्वत पर चंद्रमा जगमगा जाता है। भगवान कृष्ण ने भी शरद पूर्णिमा को रास-लीला की थी, तथा मथुरा-वृंदावन सहित अनेक स्थानों पर इस रात को रासलीलाओं का आयोजन किया जाता है। लोग शरद पूर्णिमा को व्रत भी रखते हैं, तथा शास्त्रों में इसे कौमुदी व्रत भी कहा गया है।
लंकापति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और अश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।
ये भी माना जाता है कि इस रात माता लक्ष्मी अपने धन अधिपति कुबेर संग रात्रि भ्रमण करती हैं और जो लोग रात में जागते हुए, उनका पूजन स्मरण आदि करते मिलते हैं उन्हें मालामाल कर देती हैं।
लक्ष्मी प्राप्ति की कामना से लोग चन्द्र दर्शन के प्रथम पहर में चन्द्र अमृत वर्षा उपरांत इस खीर से माता लक्ष्मी का भोग अर्ध रात्रि में लगाते हैं तो कहीं कहीं पर अगले दिन प्रातः काल फिर ब्राह्मण आदि को इसे खिलाकर स्वयं खाते हैं।

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