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पिताजी व्यापार और व्यवहार में निपुण थे, उनके दिखाए गए रास्ते पर चल रहा हूं: इंद्रजीत सिंह

भिलाई। शुक्रवार 3 अक्टूबर को ट्रांसपोर्टर और समाजसेवी स्व. वीरा सिंह के छठवें पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके सुपुत्र और एचटीसी के डायरेक्टर इंदरजीत सिंह (छोटू) ने उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए अपने दादाजी और पिताजी के संघर्ष भरे दिनों को याद करते हुए कहा कि पिताजी के जीवन की शुरुआत बहुत संघर्ष से हुई थी, वो पंजाब से दो साल की उम्र में आए थे जब मेरे दादाजी की नौकरी बीएसपी प्लांट में लगी थी, जब बीएसपी प्लांट के फाउंडेशन डल रहा था तब, मेरे दादा जी पूरा परिवार लेकर यहां आए, उस वक्त ज्यादा रोजगार नहीं था, बहुत कम सैलरी थी, पिता जी दो साल की उम्र से यही पर रहे, यही ग्यारवीं एक की पढ़ाई पूरी की। हमारा परिवार धीरे धीरे बढ़ने लगा, पिताजी चार भाई, दो बहने थे, घर में खाने तक की किल्लत थी, जब पिताजी ने होश संभाला, तो वो बचपन से ही काम करना शुरू कर दिए और बचपन से ही उनका नेचर था लोगों की मदद करने का। पहले हम सेक्टर पांच में रहते थे, अभी भी उनके यार दोस्त है मिलते है तो उनको याद करते है।

बचपन से मेरे दादा दादी भी मुझे पापा की बाते बताते थे कि तेरे पापा ऐसे लोगों की मदद करते थे फिर दादा जी ने चार पांच एकड़ का एक खेत कोहका में लिया, जो समय सौ डेढ़ सौ रुपए एकड़ में खेत मिल गया। मेरे पिता जी शुरू से ही मल्टीटास्किंग थे, एक साथ चार पांच काम कर लेते थे। वो भले पढ़े कम थे पर व्यवहार में और व्यापार में दोनों में इतने निपुण थे कि उन्होंने खेती का काम स्टार्ट किया। एक खेत में गन्ना लगाए थे तो दूसरी खेत बर्सिन लगाया। बर्सिन के लिए उन्होंने गाय-भैंस पाली। वहीं को गाय भैंस को खिलते थे जिसके दूध निकाल कर दूध बेचते थे, मही बेचते थे, घी बनाकर बेचते थे।

गन्ना रस का ठेला लगाया, सेक्टर छह ए मार्केट के सामने लगता था, उसके साथ साथ उन्होंने जनरेटर का काम स्टार्ट कर दिया। जितने गुमटी और ठेले लगते थे सामने बिजली सप्लाई करते थे, उन सभी ठेलो से मैं स्वयं एक एक रुपए किराया लिया करता था, एक रुपए बल्ब वाले से और दो रुपए ट्यूब लाइट वाले से। पिता जी एक व्यापार के साथ दूसरा व्यापार खोल देते थे। रात दिन मेहनत करते थे। उनके पास कुछ रहे ना रहे पर कोई मदद के लिए आ जाता था तो उसकी जरूर मदद करते थे। खाने के लिए बहुत शौकीन थे, जब तक वे थे तब तक घर पर या ऑफिस में की चले जाता था तो बिना उसको खाना खिलाए नहीं भेजते थे, घर पर मम्मी हमारी थक जाती थी पराठें बना बना कर। जब हमने गोडाउन चालू किया, खाना बनता था, कुक रखे थे। जितने भी लोग आते थे सबको वो खाना खिलाकर ही भेजते थे।

ट्रांसपोर्ट नगर में ऑफिस शिफ्ट हुआ तो बड़ी जगह मिली तो उन्होंने स्टार्ट किया था कि अपने यहां से कोई भी भूखा नहीं जाएगा, रोज दो ढाई सौ लोग खाना खाते थे। कोई वर्कर भूखा काम नहीं करेगा, सबको भर पेट खाना मिलेगा। वो खाने की वैल्यू जानते थे, जब वो कोहका में रहते थे तब दस दस दिन घर नहीं जाते थे। खेत में फेंसिंग नहीं थी, गाय और भैंस से फसल को रक्षा रखना पड़ता था, अलग बगल के खेत में जाम और आम फलता था तो वहीं खा कर दस दस दिन रह जाते थे। गाय का झुंड अगर कोहका हमारे खेत में आ जाते थे तो वहां से दौड़ते हुए सुपेला लाकर छोड़ते थे। बताते थे कि गाय लोग को वहां तक भगाना पड़ता है ताकि दोबारा खेत तक ना आए। वो एक एक टाइम के खाने के लिए तरसे है फिर वो ट्रांसपोर्टिंग लाइन में आए और ट्रॉली खरीदी।

ट्राली के साथ साथ गन्ना रस का भी काम चलता था, साथ में गाय भैंस और खेती का काम भी चलता था। रात दिन उस ट्राली के पीछे दौड़ना शुरू किए, अगर लोगों के गाड़ी का एक ट्रिप लगता था तो हमारे गाड़ी का दो ट्रिप लगता था। दो ट्रिप लगाने के बाद गाड़ी ब्रेक डाउन हो जाए तो रात भर गाड़ी बनाते थे, उनका लक्ष्य था कि मेरी गाड़ी खड़ी नहीं रहेगी। वहीं काम को उन्होंने मुझे सिखाया। मैं और लल्लू भाई ने एक साथ ही कंपनी ज्वाइन की, हम लोगों ने भी उनके साथ यही संघर्ष किया। उन्होंने बचपन में मुझसे खेती भी करवाई, गाय भैंस का काम भी करवाया, गन्ना रस भी बिकवाया, जनरेटर भी चलवाया, जो जो काम किए वो सब काम मुझसे करवाया। मैं भी उनके पीछे पीछे लग गया काम में, उन्होंने कहा कि अपना जीवन यही है, सब यही है, सब सिख तभी कुछ मिलेगा, बिना मेहनत के कुछ नहीं मिलेगा। शुरू से उन्होंने यही सिखाया कि अच्छे और सच्चे दिल से मेहनत करो। हम लोग भी अगर गाड़ी खराब है तो सुबह से लेकर रात तक उसके पीछे भिड़े रहते थे, उसको बनाकर ही घर जाते थे नहीं तो घर नहीं जाते थे। तब जाकर हेवी ट्रांसपोर्ट आज यहां जाकर पहुंचा है। आज हम हिंदुस्तान के पांच छह राज्यों में काम कर रहे है। उनकी लगन, उनकी मेहनत थी कि हमें मार्गदर्शन दिया तब हम आज यहां तक पहुंचे है।

नंदनी रोड, छावनी चौक पर डेढ़ सौ चक्कर लगाता था गाड़ियों के पार्ट्स के लिए। बहुत स्ट्रगल करने के बाद आज हम यहां तक पहुंचे है। उन्होंने मुझे यही सिखाया कि लोगों की मदद करना बेटा, जो अपने पास है, जितना अपने पास है उतने में ही मदद करो। भगवान तुम्हे फिर देगा, सच्चे दिल से किसी की मदद कर रहे हो तो तुम्हे फिर देगा। उन्होंने एक एक चीज के लिए संघर्ष किया था इसलिए कभी भी किसी को खाली हाथ नहीं भेजा। उनके पहले पुण्यतिथि पर नेहरूनगर गुरुद्वारा में पंद्रह केवी सोलर सिस्टम लगाकर दिया, दूसरे पुण्यतिथि पर लोगों को हॉस्पिटल की सौगात दी, तीसरे पुण्यतिथि पर डायलिसिस की मशीन लगाई और सबका निःशुल्क डायलिसिस होता है, चौथे पुण्यतिथि पर पंद्रह दिव्यागों को बैटरी ट्राई सायकल दिए, पांचवें पुण्यतिथि पर खुर्सीपार गुरुद्वारे में वाटर खुलकर और सोलर सिस्टम लगाया गया और इस छठवें पुण्यतिथि पर आज सर्व समाज के लिए शव वाहन और दो बॉडी फ्रिजर दिया गया है साथ ही जरूरतमंद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सिलाई मशीन भी वितरित की गई।

सर्व समाज से मै अपील भी करता हूं कि दिए गए हेल्पलाइन नंबर पर कॉल कर शव वाहन और बॉडी फ्रिजर का लाभ ले सकते है, आपको नगर निगम या किसी और के भरोसे रहने की जरूरत नहीं होगी। आज सर्व समाज कल्याण समिति का भी गठन किया गया है जो प्रतिभावान छात्रों, खिलाड़ियों, लड़कियों की शादी, नशामुक्ति सहित अन्य किसी भी क्षेत्र में प्रतिभावान लोगों की मदद की जाएगी। इसके अलावा समिति द्वारा लगभग हर क्षेत्र में काम किया जा रहा है, पहले सिख समाज के लिए किया जा रहा था अब सर्व समाज के लिए भी काम किया जाएगा। छठवें पुण्यतिथि पर इंद्रजीत सिंह द्वारा सर्व समाज के सभी पदाधिकारियों का शॉल पहनाकर सम्मान किया गया।

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