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इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड-बयान भी अब माने जाएंगे साक्ष्य, तीन नए आपराधिक कानूनों से जल्द न्याय मिलने की जगी आस

अंग्रेजों के शासन में मानव-वध या महिलाओं पर अत्याचार से महत्वपूर्ण तथ्य राजद्रोह और खजाने की रक्षा थी। इसके उलट नए कानूनों में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों हत्या और राष्ट्र के विरुद्ध अपराधों को प्रमुखता दी गई है। इन कानूनों की प्राथमिकता भारतीयों को न्याय देने और उनके मानवाधिकारों के रक्षा की है…

नईदिल्ली (ए)। लोकसभा से पास हुए तीन नए आपराधिक कानूनों से जल्द न्याय मिलने की आस जगी है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेने वाले भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में कई अहंम प्रावधान किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक तरीके से लिए गए बयान और रिकॉर्ड को साक्ष्य व दस्तावेज के रूप में शामिल किया गया है।

अंग्रेजों के शासन में मानव-वध या महिलाओं पर अत्याचार से महत्वपूर्ण तथ्य राजद्रोह और खजाने की रक्षा थी। इसके उलट नए कानूनों में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों हत्या और राष्ट्र के विरुद्ध अपराधों को प्रमुखता दी गई है। इन कानूनों की प्राथमिकता भारतीयों को न्याय देने और उनके मानवाधिकारों के रक्षा की है।

महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध
भारतीय न्याय संहिता ने यौन अपराधों से निपटने के लिए ‘महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध’ नामक एक नया अध्याय पेश किया है। विधेयक में नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामला को पॉक्सो के साथ सुसंगत किया गया है और ऐसे अपराधों में आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है।

सामूहिक दुष्कर्म के सभी मामलों में 20 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान नाबालिग के साथ सामूहिक बलात्कार को एक नए अपराध की श्रेणी में रखा गया है। धोखे से यौन संबंध बनाने या विवाह करने के सच्चे इरादे के बिना विवाह करने का वादा करने वालों पर लक्षित दंड का प्रावधान।

भारतीय न्याय संहिता में पहली बार आतंकवाद की व्याख्या की गई है और इसे दंडनीय अपराध बना दिया – गया है। इसके अनुसारः जो कोई भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा या प्रभुता को संकट में डालने या संकट में डालने की संभावना के आशय से या भारत में या विदेश में जनता अथवा जनता के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के आशय से बमों, डाइमामाइट, विस्फोटक पदार्थों, अपायकर गैसों, न्यूक्लीयर का उपयोग करके ऐसा कार्य करता है, जिससे, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की मृत्यु होती है, संपत्ति की हानि होती है, या करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या परिचालनं हो तो वह आतंकवादी कार्य करता है।

आतंकी कृत्य मृत्युदंड या आजीवन कारावास के साथ दंडनीय है जिसमें पैरोल नहीं मिलेगा। आतंकी अपराधों की एक श्रृंखला भी पेश की गई है जिसके अनुसार सार्वजनिक सुविधाओं या निजी संपत्ति को नष्ट करना अपराध है। ऐसे कृत्यों को भी इस खंड के तहत शामिल किया गया है जिनसे ‘महत्वपूर्ण अवसंरचना की क्षति या विनाश के कारण व्यापक हानि’ होती है।
संगठित अपराध

  • नए विधेयक में संगठित अपराध से संबंधित एक नई दांडिक धारा जोड़ी गई है।
  • भारतीय न्याय संहिता 111. (1) में पहली बार संगठित अपराध की व्याख्या की गई है
  • सिंडिकेट से की गई विधिविरुद्ध गतिविधि को दंडनीय बनाया है।
  • तए प्रावधानों में सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियां, अलगाववादी गतिविधियां अथवा भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य को जोड़ा गया है।
  • छोटे संगठित आपराधिक कृत्यों को भी अपराध घोषित किया गया। 7 वर्ष तक की कैद हो सकती है। इससे संबंधित प्रावधान खंड 112 में हैं।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में भी अहम प्रावधान

  1. भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में दस्तावेजों की परिभाषा का विस्तार करते हुए इसमें इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकार्ड, ईमेल, सर्वर लॉग्स, कंप्यूटर पर उपलब्ध दस्तावेज, स्मार्टफोन या लैपटॉप के संदेश, वेबसाइट, लोकेशनल साक्ष्य को शामिल किया गया है।
  2. ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड ‘दस्तावेज़’ की परिभाषा में शामिल
  3. इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्राप्त बयान ‘साक्ष्य’ की परिभाषा में शामिल
  4. इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को प्राथमिक साक्ष्य के रूप में मानने के लिए और अधिक मानक जोड़े गए, जिसमें इसकी उचित कस्टडी-स्टोरेज-ट्रांसमिशन- ब्रॉडकास्ट पर जोर दिया गया।

बड़े बदलाव: दस्तावेजों की जांच करने के लिए मौखिक और लिखित स्वीकारोक्ति और एक कुशल व्यक्ति के साक्ष्य को शामिल करने के लिए और माध्यमिक साक्ष्य जोड़े गए, जिनकी जांच अदालत’ द्वारा आसानी से नहीं की जा सकती है। साक्ष्य के रूप में इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड की कानूनी स्वीकार्यता, वैधता और प्रवर्तनीयता स्थापित की गई।

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