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कभी-कभी कानून को न्याय के आगे झुकना पड़ता है, इस टिप्पणी के साथ पॉक्सो केस खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने एक पॉक्सो मामले में अभियुक्त और पीड़िता के विवाह व बच्चे के जन्म को देखते हुए आपराधिक सजा रद्द की। जस्टिस दत्ता-जॉर्ज की पीठ ने कहा कि अपराध वासना का नहीं, प्रेम का परिणाम था। अदालत ने अभियुक्त से कहा कि वह परिवार का भरण-पोषण सम्मानपूर्वक करे और कानून को न्याय के लिए कभी-कभी झुकना चाहिए…

 

 

नईदिल्ली (ए)। व्यावहारिकता और सहानुभूति का संतुलित संयोजन अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे पॉक्सो मामले को खारिज कर दिया है जिसमें अभियुक्त और पीड़िता के बीच विवाह हुआ था और एक बच्चे का जन्म हुआ। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कभी कभी कानून को न्याय के आगे झुकना पड़ता है। यह देखते हुए कि वह अपराध वासना का नहीं बल्कि प्रेम का परिणाम था, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आपराधिक कार्यवाही, जिसमें दोषसिद्धि और सजा भी शामिल है, को रद्द कर दिया।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अभियुक्त से कहा कि वह अपनी पत्नी और बच्चे को न छोड़े और शेष जीवन सम्मानपूर्वक उनका भरण-पोषण करे। सुप्रीम कोर्ट में यह अपील एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी जिसे भारतीय दंड संहिता, 1872 की धारा 366 और यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम(पॉक्सो), 2012 की धारा 6 के तहत दर्ज एक मामले में 5 वर्ष और 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मद्रास हाईकोर्ट में अपीलकर्ता की अपील खारिज कर दी गई। पीठ ने कहा, अपराध की पीड़िता ने स्वयं अपीलकर्ता के साथ, जिस पर वह आश्रित है, एक शांतिपूर्ण और स्थिर पारिवारिक जीवन जीने की इच्छा व्यक्त की है ताकि अपीलकर्ता के माथे पर अपराधी होने का अमिट कलंक न लगे।  आपराधिक कार्यवाही जारी रहने और अपीलकर्ता की कारावास से केवल इस पारिवारिक इकाई में विघटन होगा और पीड़िता, नवजात शिशु और समाज के ताने-बाने को अपूरणीय क्षति होगी। पीठ ने कहा, इस प्रकार, हम यह मानने के लिए सहमत हैं कि यह एक ऐसा मामला है जहां कानून को न्याय के लिए झुकना चाहिए।

आपराधिक कानून समाज की संप्रभु इच्छा का प्रकटीकरण
पीठ ने पहले कहा था, आपराधिक कानून समाज की संप्रभु इच्छा का प्रकटीकरण है। हालांकि ऐसे कानून का प्रशासन व्यावहारिक वास्तविकताओं से अलग नहीं है। पीठ ने कहा है कि न्याय प्रदान करने के लिए एक सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। यह न्यायालय प्रत्येक मामले की विशिष्टताओं के अनुसार अपने निर्णय देता है। जहां आवश्यक हो, दृढ़ता और गंभीरता के साथ और जहां आवश्यक हो, दयालुता के साथ। जहां तक संभव हो, किसी विवाद का अंत करना समाज के सर्वोत्तम हित में भी है।

न्याय, निवारण और पुनर्वास के परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन आवश्यक….
न्याय, निवारण और पुनर्वास के परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए पीठ ने कहा कि कानून के सबसे गंभीर अपराधियों को भी उचित मामलों में न्यायालयों से करुणा द्वारा न्याय मिलता है। पीठ के अनुसार, मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, व्यावहारिकता और सहानुभूति को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता थी। पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता और पीड़िता कानूनी रूप से विवाहित थे और एक परिवार के रूप में साथ रह रहे थे।

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