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भ्रामक विज्ञापनों की शिकायतें सार्वजनिक करने के लिए डैशबोर्ड बनाए केंद्र सरकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह दवाओं और स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों पर दर्ज शिकायतों और उनकी प्रगति को सार्वजनिक करने के लिए डैशबोर्ड बनाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि आंकड़ों की कमी उपभोक्ताओं को असहाय बना देती है…

 

नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने आयुष मंत्रालय से कहा कि दवाओं और स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों पर दर्ज शिकायतों और उनकी प्रगति को सार्वजनिक करने के लिए डैशबोर्ड बनाए। शीर्ष अदालत ने कहा शिकायतों पर की गई कार्रवाई के संबंध में उचित आंकड़ों की कमी उपभोक्ताओं को असहाय और अंधेरे में छोड़ देती है।

जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मंगलवार को यह सुझाव यह देखने के बाद दिया कि ऐसी शिकायतों की प्रगति की निगरानी करने में कई बाधाएं हैं, खासकर जब ऐसी शिकायतें राज्य लाइसेंसिंग अथॉरिटी की ओर से एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजी जाती हैं। यह औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत अभियोजन के लिए भी बाधा उत्पन्न करता है क्योंकि ऐसी शिकायतों के मामले में की गई कार्रवाई रिपोर्ट पर कोई आंकड़ा आसानी से उपलब्ध नहीं होता है।

शीर्ष अदालत एलोपैथिक चिकित्सा को टारगेट करने वाले भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए पतंजलि आयुर्वेद और इसके प्रमोटरों, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की ओर से दायर मामले की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई का दायरा बढ़ा दिया है।

वकीलों से अत्यधिक नामांकन फीस लेना उनके अधिकारों का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य बार काउंसिल की ली जाने वाली अत्यधिक नामांकन फीस महत्वाकांक्षी वकील के पेशे को चुनने और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करती है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाशिये पर रह रहे वकीलों को भारी नामांकन फीस का भुगतान करने के लिए मजबूर करना समानता के सिद्धांतों पर प्रहार है।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने फैसले में कहा, सामान्य श्रेणी के वकीलों के लिए नामांकन शुल्क 750 रुपये और एससी/एसटी श्रेणियों के वकीलों के लिए 125 रुपये से अधिक नहीं हो सकता। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पेशे के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के अधिकार व अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार को कैसे प्रभावित करता है, के बीच संबंध पर गौर किया।

पीठ ने कहा, समग्र समानता के लिए गरिमा महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति की गरिमा में उसकी क्षमता को पूरी तरह से विकसित करने का अधिकार शामिल है। किसी पेशे को अपनाने का अधिकार व्यक्ति की पसंद और कमाई है। साथ ही आजीविका का अधिकार व्यक्ति की गरिमा का अभिन्न अंग है। नामांकन के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में अत्यधिक नामांकन शुल्क और विविध शुल्क वसूलना कानूनी पेशे में प्रवेश में बाधा उत्पन्न करता है।

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