सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि कोई भी अदालत किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की नाबालिग को सात महीने के गर्भ को मेडिकल तरीके से खत्म करने की मंजूरी दे दी…
नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला देते हुए कहा कि किसी भी महिला, विशेषकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय एक नाबालिग लड़की को सात महीने से अधिक की गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से खत्म करने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि इस मामले में गर्भ अनचाहा है। साथ ही, उसने पहले दो बार आत्महत्या का प्रयास किया है, ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके हित में नहीं है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि गर्भवती महिला की पसंद सर्वोपरि है, न कि जन्म लेने वाले बच्चे की। अदालत ने कहा कि जबरन गर्भावस्था को जारी रखने से नाबालिग के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और समग्र विकास पर गहरा असर पड़ सकता है।
पीठ ने कहा कि महिला की प्रजनन संबंधी स्वायत्तता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए। यदि किसी महिला को अनचाहे गर्भ को जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
अदालत ने कहा, ‘अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार, खासकर प्रजनन से संबंधित मामले, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा है। इस अधिकार को गलत प्रतिबंध लगाकर कमजोर नहीं किया जा सकता, खासकर नाबालिगों और अनचाहे गर्भ के मामलों में।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कोई भी अदालत किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए मजबूर नहीं कर सकती और खासकर नाबालिग को तो बिल्कुल नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग, को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भवस्था के लिए बाध्य करना न सिर्फ उसकी आजादी की अनदेखी होगी, बल्कि इससे उसे गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात भी पहुंच सकता है।
‘गर्भवती महिला के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए न कि जन्म लेने वाले बच्चों को’
पीठ ने यह भी साफ किया कि यह तर्क देना आसान है कि यदि महिला बच्चे को पालना नहीं चाहती तो उसे गोद दे सकती है, लेकिन अनचाहे गर्भ के मामलों में यह तर्क ठीक नहीं है।
अदालत ने कहा कि सांविधानिक अदालतों को ऐसे मामलों में गर्भवती महिला के हितों और परिस्थितियों को प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि जन्म लेने वाले बच्चे को।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर अनचाहे गर्भ को जारी रखने पर जोर दिया जाएगा, तो लोग अवैध गर्भपात केंद्रों का सहारा लेने को मजबूर होंगे, जिससे महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य को खतरा बढ़ेगा।

















