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सलवार खींचना, छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं…हाईकोर्ट की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट का आरोपी को नोटिस

मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि वो अपने पिता के साथ स्थानीय फोटोग्राफी स्टूडियो में गई थी। फोटो लेने के बाद स्टूडियो मालिक ने कंप्यूटर पर फोटो देखने के बहाने उसके पिता को बाहर इंतजार करने को कहा। जब पिता जी बाहर चले गए तो अंदर से स्टूडियो का दरवाजा बंद कर दिया। फिर उसका सलवार उतारने का प्रयास किया। बलात्कार करने की नीयत से उसकी छाती दबाई। उसका चिल्लाना चीखें सुनकर उसके पिता ने दरवाजे को तोड़ा…

 

नईदिल्ली (ए)। याद होगा आपको, इसी साल 9 जुलाई को पटना हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की बलात्कार के प्रयास के अपराध में हुई सज़ा रद्द करते हुए कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाना बलात्कार की कोशिश नहीं माना जा सकता। उस वक्त तमाम हलकों में इस फैसले की चर्चा हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की आलोचना की है और पटना हाईकोर्ट के उस बेहद संवेदनशील और विवादित फैसले पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान यानी Suo Motu मामला दर्ज किया है।

कानूनी एंगल यह है कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि महिला का गुप्तांग छूने या स्पष्ट मंशा साबित हुए बिना सलवार खींचने और सीने से छेड़छाड़ को IPC की धारा 376/511 के तहत बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। इस फैसले में की गई टिप्पणियों पर गौर करने के बाद शीर्ष अदालत ने प्रथम दृष्टया अनुचित माना है। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और आरोपी को जवाबदेही के दायरे में लिया है।

पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें महिला की सलवार खींचने का प्रयास करने और उसके सीने को दबाने के कृत्य को दुष्कर्म के प्रयास के लिए पर्याप्त नहीं माना गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना था कि ऐसे कृत्य महिला की लज्जा भंग करने के लिए आपराधिक बल के प्रयोग के अंतर्गत आईपीसी की धारा 354 के तत्वों को पूरा करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को “आपत्तिजनक” बताते हुए आरोपी को नोटिस जारी किया है। सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कुछ ऐसी टिप्पणियां हैं, जिन पर विचार की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद इन टिप्पणियों को हटाने पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने बिहार के महाधिवक्ता को स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस की तामील सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया।

मामला हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिठिया पाठक बनाम बिहार राज्य, आपराधिक अपील संख्या 775/2013 से जुड़ा है।पटना हाई कोर्ट की एकलपीठ ने 9 जुलाई 2026 को फैसला सुनाया था। इसमें दुष्कर्म के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने के मामले में आरोपी की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया गया था।

हाई कोर्ट ने कहा था कि केवल सलवार खींचने का प्रयास और सीने को दबाने जैसे कृत्य, जब तक दुष्कर्म करने की मंशा को स्पष्ट रूप से स्थापित करने वाला प्रत्यक्ष कृत्य सामने न हो, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के साथ धारा 511 की परिभाषा के तहत दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बनाते।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश में की गई टिप्पणियों पर विचार के लिए मामले का संज्ञान लिया है। आरोपी को नोटिस जारी किया गया है और उसका पक्ष सुनने के बाद टिप्पणियों को हटाने पर विचार किया जाएगा।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट की फैसले की कुछ बातें आपत्तिजनक हैं। CJI ने बिहार के एडवोकेट जनरल से कहा कि आरोपी का पक्ष सुनना तय किया जाए, ताकि मामले में सुनवाई हो सके।

कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह आगे यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को लेकर अलग से विस्तृत आदेश दे सकती है। दरअसल पहले भी सुप्रीम कोर्ट में भी पटना हाई कोर्ट के उस फ़ैसले की बात उठी थी, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाकर शारीरिक छेड़छाड़ करना ‘रेप की कोशिश’ के दायरे में नहीं आता।

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