दुर्ग। बारिश की हर बूंद को बचाने के लिए जिला में जल-सुरक्षित बनाने की दिशा में कलेक्टर अभिजीत सिंह के मागदर्शन में जल संरक्षण अभियान को जनभागीदारी से नई सुरक्षा मिली है। ग्रामीण इलाकों में झील गहरीकरण, चेकडेम, डबरी, जल अवशोषण ट्रेंच, सोक पिट, कोयला नाली और कुआं जैसे विभिन्न जल संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। रोजगार एवं विकास द्वारा विकसित भारत-जी राम जी योजना से जुड़े श्रमिकों और महिलाओं की भागीदारी ने जल संरक्षण और भू-जल पुनर्भरण की पहल की है।
अभियान के तहत बारिश के पानी को गांव में ही रोक और जमीन पर खोदकर देखा जा रहा है। पुराने तालाबों का गहराईकरण कर उनकी जलधारण क्षमता तैयार की जा रही है। चेकडेम और डबरियों के माध्यम से वर्षा जल को रोककर सरकार तक पानी पाइपलाइन की व्यवस्था मजबूत की जा रही है। जहां पर आवासीय और सार्वजनिक स्थानों पर रहने वाले लोगों के लिए जमीन में नामांकन के लिए सोक पिट तैयार किए जा रहे हैं।
जिले के क्षेत्रीय प्रोजेक्ट में अब तक 2,726 सोक पिट का निर्माण पूरा हो चुका है। इनमें दुर्ग में 727, धमधा में 1,096 और पाटन में 903 सोक पिट शामिल हैं। इनमें वर्षा एवं घरेलू उपयोग के पानी को जमीन में उतारकर भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
जल संरक्षण की दिशा में खाई का निर्माण भी बड़े पैमाने पर किया गया है। जिले में कुल 66,500 ट्रेंच का निर्माण पूरा हो चुका है। इनमें जिला पंचायत दुर्ग में 24,000, धमधा में 27,500 और पाटन में 15,000 ट्रेंच शामिल हैं। ट्रेंच वर्षा जल के बहाव को धीमा कर उसे जमीन में रिसने का अवसर देते हैं। इससे जल संरक्षण के साथ भू-जल पुनर्भरण और मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
वर्षा जल को जमीन में सूचीबद्ध करने के लिए जल अवशोषण ट्रेंच भी प्रभावशाली माध्यम बन रहे हैं। एक ग्राम पंचायत क्षेत्र में 66,500 वाट का निर्माण किया गया है। प्रत्येक वाट की लंबाई 2 मीटर, चौड़ाई 1 मीटर और गहराई 1 मीटर है तथा इसकी जल अवशोषण क्षमता लगभग 2 घन मीटर है। इस तरह 66,500 वाट की कुल जल अवशोषण क्षमता करीब 1,33,000 घन मीटर यानी 13.3 करोड़ लीटर है। एक अच्छी वर्षा में इतनी मात्रा में पानी को जमीन में समेटने की क्षमता तैयार हो गई है। इस बारिश के पानी के बहाव को कम करने के साथ भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिलेगा।
विकसित भारत-जी राम जी योजना से जुड़े श्रमिकों के तहत भी जल संरक्षण की दिशा में विभिन्न कार्य कार्यकर्ता जा रहे हैं। इनमें 246 तालाब निर्माण, 71 तालाब जीर्णाेद्धार, 142 तालाब गहरीकरण, 28 तालाब निर्माण और 14 तालाबों के रिसाइकिलिंग कार्य शामिल हैं। इन कार्यों से वर्षा जल संरक्षण, जल विक्रेता व्यवस्था एवं भू-जल पुनर्भरण को लेकर बैठक की अपेक्षा है।
112 नवा तरिया अभियान के तहत तालाब गहरीकरण और डबरी निर्माण को भी प्राथमिकता दी गई है। जिले में 30 डबरी निर्माण कार्य किये गये हैं। इनमें दुर्ग जिले में 7, धमधा में 18 और पाटन में 5 डबरी शामिल हैं। इसके साथ ही अमृत सरोवर और अन्य जल अनुबंधों के निर्माण एवं गहरीकरण के कार्य भी जारी हैं।
जल संरक्षण का सीधा लाभ खेती और ग्रामीण उत्पादकों से मिलने की उम्मीद है। तालाबों और होटलों में पानी की बढ़ती मात्रा से सींच सुविधा मजबूत होगी। जल और खाई के माध्यम से भू-जल रिचार्ज को बढ़ावा मिलेगा, जिससे भविष्य में किसानों के लिए समुद्र तट के जल क्षेत्र की संभावनाएं बेहतर हो सकेंगी। बारिश के कारण पानी का बहाव कम होने से मिट्टी के कटाव पर भी असर पड़ेगा। इस तरह की जल संरक्षण संरचनाएं खेत, मिट्टी और भू-जल-तीनों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं।
अभियान की सबसे बड़ी विशेषताएँ और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। जल संरक्षण को केवल सरकारी निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रखा गया है, इसे आईएसओ जिम्मेदारी से जोड़ा गया है। अपने ग्रामीण गांव की जरूरत के मुताबिक जल स्तर के निर्माण और संरक्षण में सहयोग कर रहे हैं। इससे जल संरक्षण के प्रति जागरूकता, विकास के साथ भविष्य में पानी सुरक्षित रखने की सामूहिक सोच भी मजबूत हो रही है।
जिले में जल संरक्षण कार्य का उद्देश्य केवल वर्तमान में पूर्ण करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए जल संरक्षण को सुरक्षित करना है। तालाब, डबरी, चेकडेम, ट्रेंच, वाट और सोक पिट जैसी झीलों के माध्यम से वर्षा जल को अधिक से अधिक मात्रा में रोकने और भू-जल रिचार्ज करने का प्रयास किया जा रहा है।
66,500 वाट की 13.3 करोड़ लीटर तक पानी सोखने की क्षमता, 66,500 ट्रे और 2,72 इंच 6 सोख पिट जल संरक्षण के सामूहिक प्रयास की तस्वीरें सामने हैं। जनभागीदारी से आगे बढ़ने का यह अभियान श्हर बूंद अनमोलश् के संदेश को जमीन पर साकार करने के लिए दुर्ग जिले को जल-सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।










































