BREAKING

खास खबरदेश-दुनियाफीचर्ड

प्राइवेट स्कूलों को आरटीई एक्ट के तहत राज्य सरकार द्वारा आवंटित किए गए छात्रों को तुरंत एडमिशन देना ही होगा : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि प्राइवेट स्कूलों को आरटीई (RTE) एक्ट के तहत राज्य सरकार द्वारा आवंटित किए गए गरीब बच्चों को तुरंत एडमिशन देना ही होगा। अदालत ने लखनऊ के एक स्कूल की याचिका खारिज कर दी, जिसने 25% कोटे वाले बच्चे को दाखिला देने से मना किया था। कोर्ट ने इसे ‘राष्ट्रीय मिशन’ बताते हुए कहा कि शिक्षा के अधिकार से कोई भी स्कूल खिलवाड़ नहीं कर सकता…

 

 

नईदिल्ली (ए)। क्या बड़े और महंगे प्राइवेट स्कूल अब गरीब बच्चों को एडमिशन देने से रोक पाएंगे? शिक्षा हर बच्चे का मौलिक अधिकार है, लेकिन कई बार प्राइवेट स्कूल अपनी मनमानी करते हुए कमजोर वर्ग के बच्चों को दाखिला देने से साफ मना कर देते हैं। अब ऐसे ही स्कूलों की मनमानी पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में आदेश दिया है कि आस-पड़ोस के (नेबरहुड) प्राइवेट स्कूलों को आरटीई (आरटीई – शिक्षा का अधिकार) एक्ट के तहत राज्य सरकार द्वारा आवंटित किए गए छात्रों को तुरंत एडमिशन देना ही होगा। अदालत ने लखनऊ के एक प्राइवेट स्कूल (लखनऊ पब्लिक स्कूल, एल्डिको) की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने 25 प्रतिशत कोटे के तहत चुने गए एक गरीब बच्चे को दाखिला देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि एडमिशन देने में देरी करना बच्चों के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है।

आखिर क्या है लखनऊ के इस प्राइवेट स्कूल का पूरा विवाद?

  • उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग ने 2024-25 के शैक्षणिक सत्र के लिए एक बच्चे का नाम आरटीई (RTE) के तहत लखनऊ के इस स्कूल में भेजा था।
  • राज्य सरकार द्वारा बच्चे का नाम भेजे जाने के बाद भी स्कूल ने उसे यह कहकर एडमिशन देने से मना कर दिया कि उसकी योग्यता पर उन्हें शक है।
  • इसके बाद बच्चे के परिवार ने न्याय के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट ने स्कूल को तुरंत एडमिशन देने का आदेश दिया।
  • हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ स्कूल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

अगर स्कूल को सरकार के फैसले पर आपत्ति हो तो क्या करें?

  • सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कोई भी स्कूल सरकार द्वारा चुने गए छात्र के मामले में खुद जज (अपील अधिकारी) बिल्कुल नहीं बन सकता है।
  • एक बार जब राज्य सरकार किसी बच्चे का फॉर्म जांचकर उसे स्कूल आवंटित कर देती है, तो स्कूल का यह फर्ज है कि वह बिना कोई सवाल किए उसे एडमिशन दे।
  • अगर स्कूल को सरकार के चयन पर कोई असहमति या भारी आपत्ति है, तो वे संबंधित अधिकारी से इसकी शिकायत कर सकते हैं।
  • लेकिन, शिकायत के फैसले का इंतजार किए बिना, स्कूल को उस बच्चे को तुरंत दाखिला देना ही होगा जिसका नाम सरकार की लिस्ट में है।

सुप्रीम कोर्ट ने 25 प्रतिशत कोटे को ‘राष्ट्रीय मिशन’ क्यों कहा?

  • अदालत ने कहा कि बिना सरकारी मदद वाले (अनएडेड) प्राइवेट स्कूलों में कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ है।
  • यह कानून सिर्फ एक प्रशासनिक नियम नहीं है, बल्कि समाज से जाति, वर्ग और लिंग के गहरे भेदभाव को खत्म करने का एक बड़ा हथियार है।
  • आरटीई (RTE) एक्ट की धारा 12 के तहत यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि बचपन से ही बच्चों के बीच सामाजिक समानता की भावना आ सके।
  • जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अगुवाई वाली बेंच ने जोर देकर कहा कि इस नियम को पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ लागू किया जाना चाहिए।

एडमिशन देने से मना करने पर होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी खास जोर दिया कि आरटीई ढांचे को सही तरीके से लागू करने के लिए स्कूलों को पारदर्शी होना पड़ेगा। स्कूलों के लिए यह जरूरी है कि वे खाली सीटों की जानकारी पहले से ही सार्वजनिक रूप से साझा करें। साथ ही, एडमिशन की पूरी प्रक्रिया में कोई भी गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। अगर कोई स्कूल किसी बच्चे को एडमिशन देने से मना करता है, तो उसे इसके पीछे का कारण लिखित रूप में देना होगा, जिसकी शिक्षा विभाग द्वारा बेहद कड़ी जांच की जाएगी।

अंत में सर्वोच्च अदालत ने एक कड़ा संदेश देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा पाना एक मौलिक अधिकार है। अगर आरटीई एक्ट (2009) को उसकी मूल भावना के साथ लागू नहीं किया गया, तो यह अधिकार सिर्फ एक खोखला वादा बनकर रह जाएगा। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बिल्कुल सही ठहराते हुए सख्त आदेश दिया कि उस छात्र को बिना एक भी दिन की देरी किए स्कूल में दाखिला दिया जाए।

Related Posts