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आज से चैत्र नवरात्रि प्रारंभ, मां शैलपुत्री की करे विधि- विधान से पूजा होगी मनोकामना पूरी

हिंदू पंचांग के अनुसार 19 मार्च 2026 यानी आज से चैत्र नवरात्र की शुरुआत हो चुकी है, जिसका समापन 27 मार्च को श्री रामनवमी के मौके पर होगा. आज से ही हिंदू नववर्ष (2083) की भी शुरुआत हो चुकी है. चैत्र नवरात्र के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे जातक पर मां दुर्गा का आशीर्वाद बना रहे…

 

 

नईदिल्ली (ए)। चैत्र नवरात्रि की शुरुआत आज से हो गई है। आज नवरात्रि का पहला दिन हैं। आज के दिन मां दुर्गा के सर्वप्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस शुभ दिन कलश स्थापना के बाद विधि-विधान से मां शैलपुत्री की पूजा और भोग लगाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। माता शैलपुत्री को शक्ति का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में मां शैलपुत्री को चंद्रमा ग्रह की स्वामी माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां की पूजा करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है और अशुभ प्रभाव दूर होते हैं।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। देवी भागवत पुराण के अनुसार आदिशक्ति का यह प्रथम रूप शांत और तेजस्वी है। वृषभ पर सवार श्वेत वर्ण में मां के दाहिने हाथ में त्रिशुल है जो शक्ति का प्रतीक है। मां के बाएं हाथ में कमल का फूल पवित्रता को दर्शाता है। वहीं, मां के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा का जन्म पर्वत राज हिमालय के घर हुआ था। इस वजह से मां के इस अवतार को शैलपुत्री कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है पर्वत की पुत्री। मां की सवारी बैल होने से उन्हें वृषारुधा के नाम से भी जाता जाता है।

इस बार चैत्र नवरात्र में घटस्थापना के दो शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं. पहला शुभ मुहूर्त आज सुबह 6 बजकर 52 मिनट से सुबह 7 बजकर 43 मिनट तक रहेगा. इसके बाद, आप अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12 बजकर 05 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक घटस्थापना कर सकेंगे।

मां शैलपुत्री का मंत्र
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्,
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता।
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम्,
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्।
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:,
ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मां शैलपुत्री की पूजा विधि

  • नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
  • चौकी को गंगाजल से शुद्ध करके उस पर मां शैलपुत्री की प्रतिमा स्थापित करें।
  • इसके बाद मां को सिंदूर, अक्षत और सफेद या लाल फूल अर्पित करें।
  • विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें और घी का दीपक जलाएं।
  • मां शैलपुत्री की पूजा षोडशोपचार विधि से करें, जो 16 चरणों से होती है।
  • इसके बाद कपूर या घी के दीपक से मां शैलपुत्री की आरती उतारें।
  • इसके बाद पूजा में हुई गलती के लिए मां से क्षमा याचना करें।
  • पूजा के बाद पूजा के बाद दुर्गा स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

मां शैलपुत्री का भोग
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद रंग की वस्तुओं का भोग लगाना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। मां को सफेद रंग की वस्तुएं प्रिय हैं। सफेद रंग को शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता इसलिए मां को गाय के दूध से बनी खीर या सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है। भोग बनाते समय गाय के घी का प्रयोग करना उत्तम माना गया है। मां को सफेद वस्तुओं का भोग लगाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है।

मां शैलपुत्री व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में मां शैलपुत्री देवी सती के रुप में प्रकट हुई थीं। देवी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया और उसके लिए सभी देवताओं को निमंत्रित भिजवाया। बस उन्होंने भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। देवी सती पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ में जाना चाहती थीं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि यज्ञ में सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया है, लेकिन हमें नहीं बुलाया गया। ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं है।

भगवान शिव के बार-बार समझाने के बाद भी देवी सती वहां जाने की जिद पर अड़ी रहीं। ऐसे में भगवान शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। देवी सती जब अपने पिता के घर पहुंची तो मां ने उन्हें स्नेह दिया। इनकी माता को छोड़कर सभी ने उनका उपहास किया। बहनों की बातों में भी व्यंग झलक रहा था। भगवान शिव के प्रति तिरस्कार का भाव था। प्रजापति दक्ष ने भी उनके लिए सामने भगवान शिव के लिए अपशब्द कहें। अपने पिता द्वारा किए गए अपमान के चलते सती बहुत आहत हुईं। उस समय देवी सती ने खुद को अग्नि में जलाकर भस्म कर लिया।

भगवान शंकर को जब यह बात पता चली तो वह बहुत क्रोधित हो गए और और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके बाद, सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर जन्म लिया। इसीलिए उन्हें शैलपुत्री कहा गया। आगे चलकर उनका विवाह भगवान शिव से हुआ और वो दोबारा उनकी अर्धांगिनी बन गईं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा-अर्चना करने से जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

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